|
مشواري ابتدى
من حيثُ انتهى |
|
وما في حيـاتي
مـن مَـولـدِ |
|
ابتدى كـأيِّ
قصة حبٍّ لشابٍ |
|
عشقَ وبـاتَ
حبـهُ مهـددِ |
|
وانتهى
بحكايةِ شيخٍ قضى عمره |
|
الذي خلـى في
أكبر مسجـدِ |
|
وذلك لأني
أطعتُ نفسي مرةً , |
|
ولأني كرهت
ذاتي مرةً..فجددِ |
|
تبـالغُ في
حيـاةٍ أنتَ صاحبها |
|
وتلعنُ مـن
يـدخلهـا مُجندِ |
|
بجيشٍ كـأن
أفـراده لُغـمٌ |
|
توارى ليسكنَ أقرب العُضـدِ |
|
جسـدٌ
تعـوَّدَ على الهـوى |
|
فبات بلا
هـوىً كـأيّ جسدِ |
|
لماذ؟!
سـألتُهـا مـراراً ولكن |
|
ما من جوابٍ
.. فلمَ جُهدي؟! |
|
مـا من أحـد
يـرضى لنفسه |
|
بذلٍ , وليس
الأمـر بـالكَبَدِ |
|
لكن حيـاتي
مسـرحٌ .. يلعبُ |
|
فيه النـاس مـن
كـلِّ بلـدِ |
|
لـذا تـركتهـا
كمـا هيْ .. |
|
ورضيـتُ
بالهمِّ والغمِّ والنكدِ |