|
قالـوا كلاماً عني وعنها |
|
فباتَ الناسُ هماً أتـاهـا |
|
وأدركوا أننا نصدقُ معاً |
|
فغـاظهم أنـي أراهـا |
|
ونـادوا علينا كأننـا... |
|
حُمُرٌ تهرب
مـن قضاها |
|
ولم يـدركوا
أنني أرنـو |
|
إلـى نيـلِ
صبـاهـا |
|
ولم
يعلمـوا
أن قلـبي |
|
ينبضُ بحبٍ
نالَ رضاهـا |
|
وبـات حلمهُ...
يـوماً |
|
يرى فيه نفسه
آخر مُناها |
|
وأول فرحها
...وأصدقَ |
|
قولها...وآخرَ بكـاهـا |
|
ولكـنَّ الحلـم
تبدد.. |
|
وأصبح
كابوساً أن أراها |
|
تمشي نحوي ..
أو تبسمُ |
|
لي.. أو
تشيـرُ لي بيداها |
|
أقدامها
ثبتت...ودموعها |
|
جمدتْ.. فالقـدر أبقاها |
|
بمكانها
ترضى ... فكلامُ |
|
الناسِ سـوّد
سمـاهـا |
|
فقبلتُ
بالفراقْ..وحزنتُ |
|
للوداع
..وقبّلتُ ثراهـا |
|
وذهبت بعيداً
وأنـا أعلم |
|
أنني ابتعدت
فلنْ ألقاهـا |
|