|
في
مسـاءٍ دافـئٍ التقينـا |
|
والناسُ عنـا
في الخدورِ ترقـدُ |
|
لا عـاذلٌ
بيننـا يُـراقـبنـا |
|
ولا حـاقـدٌ
معنـا ولا نِـدُّ |
|
رأيـتُ
عينيـكِ ليلـةً صافيةً |
|
وأحـداقـكِ
لؤلـؤاً أسـودُ |
|
وشفتيـكِ
حـديقـةً ورديـةً |
|
فيهـا ورودٌ
والطيـرُ تنشـدُ |
|
وشعـركِ ..
ذاكَ الليلُ الطويلُ |
|
تسرِّحُـهُ
أيـادٍ كنجمٍ يصعدُ |
|
ووجهكِ ..
تلكَ اللوحةُ الشرقية |
|
فيه أنفٌ
شامخٌ ورمشٌ يسجدُ |
|
لا تقولي أني
أراكِ بعينِ العاشقِ |
|
بـل قـولي
أنَّ عيـني تشهدُ |
|
أنَّكِ وردةٌ
في ظـلِّ حـديقتنـا |
|
ومنكِ يغـارُ
الزهـرُ والوردُ |
|
لا تظني أنَّ
غـيري سيقطفكِ .. |
|
فأنا هنـا
الملكُ .. وأنا الأسدُ |
|
ولن يكـون
غـيري رجالٌ أبداً |
|
فبعدَ
مَولدي النسـاءُ لا تلدُ |
|
قِفي ،
فإنـكِ اليـومَ حبيـبتي |
|
ولا تنسي
فالشكرُ للهِ والحمدُ |